Path to humanity

Path to humanity
We cannot despair of humanity, since we ourselves are human beings. (Albert Einstein)

Friday, June 3, 2011

फिर एक रात है...!!!


आज फिर एक रात है
अनजानों से भरी
बातें हैं सबकी देखो,
कुछ सुनी, कुछ अनकही
ये साथ के राही
कुछ कुछ पहचाने से हैं,
फिर एक पल लगता है
कितने बेगाने से हैं...

ये छोटा बच्चा
इतना प्यारा क्यों हैं,
इसकी बातों का पिटारा
इतना सारा क्यों हैं?
इस औरत के गहने
चमक-चमक रहे हैं
आँखों में ख़ुशी लिए
दमक-दमक रहे हैं...

पर ये राह, थोड़ी धीमी सी है
हाँ, बस तुम्हारी कमी सी है
क्या हम कुछ बातें करें!!
या साथ रहकर भी चुप चुप रहे
खामोश तो यूँ
सारी ज़िन्दगी बीतेगी
पर एक "दोस्त" के बिना
अधूरी ही रहेगी

आज फिर एक रात है
अन्जानों से भरी...!!!


Wednesday, January 26, 2011

'सच' थोड़ा सा...


क्या लिखूं
लिखूं कोई बात
या एक सहमा सा एहसास
या लिखूं थोड़ा सा
या कुछ सच


सारी रात अँधेरे में
आँखें मेरी
कुछ ढूंढा करती है
शायद खोज ये
एक असीम नींद की होती है
जिसके बाद सिर्फ और सिर्फ
एक क्षितिज होता है

उस पार क्षितिज के
मेरा इंतज़ार करते हुए
कोई, ना जाने कब से बैठा है
कौन है ये?
मैं हूँ या मेरी प्रतिछाया
या ये सिर्फ मेरा एक भ्रम है
कोई नहीं है उस पार
कोई नहीं कर रहाइंतज़ार
वहां तक जाने की छटपटाहट सी होती है
पर जाने कौन सी बात
मुझे बांधे सी रहती है

कितना मुश्किल हैये
सोचकर
आँखें बोझिल होने लगी हैं
और धीरे धीरे मन  को
नींद की गहराईयों में
डुबोने सी लगती हैं
सांस लेना
कितना मुश्किल है यहाँ
कितने लोग हैं इस गहराई में
सारे के सारे अनजाने
या कुछ कुछ पहचाने से
ये मिट्टी कितनी गीली है
सारा कीचड़ पैरों में
सना जा रहा है
कब्र की खुशबू का एहसास
इतना भारी क्यों है
कौन हैं ये लोग
मुझसे बांतें क्यों नहीं करते
क्या नाराज़ हैं मुझसे?

तभी कहीं दूर
लगा जैसे तुम हो
पर मुझे पहचान क्यों नहीं रही हो
कुछ तो कहो
दम घुट रहा है
नींद टूट जाएगी
या मैं!!

'सच', कहा था तुमने
लिखने को.
देखो कितना
अजीब सा है
ना ही ये थोड़ा है
और ना ही अच्छा
पर सच तो सच है
कैसे बदलूँ मै उसे
फिर घुट रहा है दम
जैसे नींद  जाएगी
गहरीबहुत गहरी
और ले जाएगी
पार
उस क्षितिज के
खुद से दूर
हमेशा के लिए........

Thursday, December 16, 2010

My Love Is Changed


Now, if I don't call you
a glittering starlet of the sky
or a beautiful rose bud.
its not, my Love is fake-
in fact the patterns are so changed.
And now, that your lips are not as pink
which I used to praise
or skin with lines
that was smooth like phrase
my 'love'
for your soul has not changed.
But your words are still so soft
those were soothing to my heart
and your touch is warm
when I shiver in the rain.
believe me 'my love'
"I am alone but still the same.

Monday, October 11, 2010

ये नाम है जो तेरा.....


ये नाम है जो तेरा, मुझको थामे सा रहता है
जब हो जाता हूँ अकेला, धीरे से कुछ कहता है
देता है शक्ति जीने की, सीमाओं में रहने की
फिर ना जाने क्यूँ, आँखों से दरिया बहता है
जब सांसें थम सी जाती हैं, आँखें बंद हो जाती हैं
हौले क़दमों की आहट से, दिल को मेरे छू लेता है
उन काली खाली रातों से, करनी है मुझको दोस्ती
अकेले चलते इन राहों पे मेरा समय भी बीता है

ये नाम है जो तेरा, मुझको थामे सा रहता है
जब हो जाता हूँ अकेला, धीरे से कुछ कहता है

क्यूँ नहीं हो तुम मेरे पास, क्या जानो तुम इसका एहसास
बस नाम यही है तेरा, जो मुझसे बातें करता है
जब आँखें बंद किये मै सपनों में खोया रहता हूँ
ये नाम वहां भी आकर, गुमसुम सा बैठा रहता है
हर पल, हर लम्हा, ना जाने क्या क्या कहता है
खुद को शायद है भुला दिया, फिर भी अच्छा सा लगता है
अब मत रोना ऐ नाम मेरे, वरना अकेला हो जाऊंगा
खुद, खोके मिलना मुश्किल है, स्नेहिल तुमसे कहता है|

(NoteNo part of this post may be published, reproduced or stored in a retrieval system in any form or by any means without the prior permission of the author.)
© Snehil Srivastava

Saturday, September 25, 2010

स्मृतियाँ..........

स्मृतियाँ, 
कभी रुलाती हैं
तो कभी गुदगुदाती हैं
कभी मासूम बच्चा बन, 
छोटा-सा बालक बन 
अपनी तोतली बोली में 
मन की बातें कह जाती हैं !

स्मृतियाँ,
दिलाती हैं याद 
कभी माँ का दुलार, 
तो कभी पिता का प्यार, 
कभी दादी माँ की
और कभी नानी माँ की 
कहानी बनकर 
ले जाती हैं 
परियों के लोक,
जहाँ दिखाई देते हैं 
चाँद और सितारे, 
जो लगते हैं मन को 
मोहक और प्यारे, 
दिखाई देते हैं वहाँ
रंग-बिरंगे फूल 
जहाँ नहीं होती, 
उदासी की धूल 
फूल अपनी सुगंध 
बिखेरते हैं चारों ओर, 
औरों को भी सिखाते हैं 
सुगंध फैलाना, 
मनभर खुशबू लुटाना 
सबको हँसाना 
और गुदगुदाना 
तन के साथ-साथ 
मन को भी सुंदर बनाना !

स्मृतियाँ, 
कभी ले जाती हैं 
उस नन्हे संसार में 
जहाँ प्यारी-सी 
दुलारी-सी गुड़िया है 
उसका छोटा-सा घर है !
और है 
भरा-पूरा परिवार 
नहीं है दुख की कहीं छाया, 
पीड़ा की कोई भी लहर 
यहाँ-वहाँ कहीं पर भी 
कभी दिखाई नहीं देती !

स्मृतियाँ,
जब ले जाती हैं 
भाई-बहिनों के बीच 
जहाँ खेल है,तालमेल है 
तो कभी-कभी 
बड़ा ही घालमेल है !

स्मृतियाँ,
ले जाती हैं 
दोस्तों के बीच 
जहाँ पहुँचकर 
देती हैं अनायास
ऊँची उड़ान मन-पतंग को, 
देती हैं अछोर ऊँचाइयाँ, 
तो कभी कटी पतंग-सी 
देती हैं निराशा मन को, 
कभी उड़नखटोले में
सैर करातीं हैं,
कभी ले जाती हैं
अलौकिक दुनिया में
जगाती हैं मन में आशा 
रखती हैं सदैव दूर दुराशा !

स्मृतियाँ ,
खो जाती हैं 
भीड़ में बच्चे की तरह 
जब मिलती हैं 
तो माँ की तरह 
सहलाती हैं,दुलारती हैं 
और रात को 
नींद के झूले में 
मीठे स्वर में 
लोरी सुनाती हैं 
ले जाती हैं 
कल्पना के लोक 
जहाँ मन रहता है 
कटुता से दूर,बहुत दूर, 
मन बजाता है 
खुशी का संतूर !
दुःख की अनुभूतियाँ 
मन में नहीं समाती हैं; 
सुख की कोयल 
कभी गीत गाती है 
तो कभी 
मधुर-मधुर स्वर में 
गुनगुनाती हैं,
और कभी
पंचम स्वर में
जीवन का 
मधुर राग सुनाती हैं





द्वारा- डॉ. मीना अग्रवाल