Path to humanity

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We cannot despair of humanity, since we ourselves are human beings. (Albert Einstein)
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Tuesday, August 30, 2016

'कई दफ़ा...'
Human again!

उस ताख पर लिपटी कालिख
मन का उजाला लिए हंसती थी
मैंने महलों को तो जाने कितनी दफ़ा
रोते हुए देखा है।
खुदा उन घरों में बसता है,
जहाँ मोहब्बत रहती है।
मैंने सर परस्तों को जाने कितनी दफ़ा
नफरत करते हुए देखा है।
बेजा हुई हर वो धड़कन
जिसने इंसानियत से मुंह है मोड़ा
मैंने फरिश्तों को जाने कितनी दफ़ा
क़त्ल करते हुए देखा है।
रूह को सुकून मिल जाता है
बस एक बार के इंसान होने से
मैंने जानवरों के दिल में
इंसान बनते हुए देखा है।

-Snehil Srivastava
Picture credit: www.wakingtimes.com
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© Snehil Srivastava

Tuesday, May 3, 2016

दर्पण का जीवन
The imaginary world of a mirror


वो एक विहंगम दृश्य था
मनुष्य, दर्पण सदृश्य था
वो सत्य था, घनघोर बहता रक्त था
उसका प्रतिरूप मौन था
आखिर! वो आखिर कौन था?
उसमें मर्म था, जाने ये कैसा कर्म था?
उनकी दिशाएं एक थीं
किन्तु एक-दूसरे के विपरीत थीं।
दर्पण वो अपने दर्प में
ना जाने किस सन्दर्भ में
खुद से अलग अब हो गया
अपनी मनुष्यता खो गया
निर्जीव है, स्वयंभू होकर भी
जीवित भी होगा, लगता नहीं
दर्पण का जीवन, पूर्ण है
मनुष्यत्व जैसा अपूर्ण है।


-Snehil Srivastava
Picture credit: www.freewords.com.br
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© Snehil Srivastava

Thursday, December 17, 2015

'सूखे हुए चावल'
'One plate rice and a hungry child'

सूखे हुए चावल, जब आज मुझे सड़क के किनारे पड़े मिले
तो मुझे किसी फ़िल्म में भूख से बिलखते दो बच्चे याद आ गए
यूँ तो फ़िल्में पटकथा के साथ चलती हैं
किन्तु यही फिल्में हमारे इसी संभ्रांत समाज का दर्पण भी हुआ करती हैं
एक रोज मैंने भी
कुछ सूखी रोटिया, थोड़ी बची हुई सब्जी और एक कटोरी दाल फेंक दी थी
ये और बात है, उस सारे दिन मुझे 'किसी और' वजह से
भूखा रहना पड़ा था
ये सूखे, सड़क किनारे पड़े हुए, चावल
जब बने होंगे, मुझे लगता है-
बड़ी अच्छी महक आयी होगी
और जिसने भी इन्हें पकाया होगा
उसका मन इसी बात को सोचकर तृप्त हो गया होगा
कि खाने वाले की भूख, इसके उबलने से आने वाली महक से ही मिट जायेगी
पर जब ये किसी की भूख मिटाने के लिए बने थे
तो यहाँ यूँ पड़े ही क्यों हैं
काश आज कोई सारा दिन भूखा न रहा हो
काश ये भी किसी फ़िल्म की कहानी ही होती
काश ये चावल 'किसी और' की भूख मिटा सकते
काश...!

-Snehil Srivastava
Picture credit: www.livinghistoryfarm.org
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Monday, May 11, 2015

ज़ूनी
Zooni

ज़ूनी हुआ करता था उसका नाम।
एक दिन ना जाने किस बात पर उफ़क़ पड़ी।
लाख पूछा, पर वो आँखें लाल किये घंटों छत को घूरती रही।
खाना भी नहीं खाया। सुबह एक ग्लास दूध का दिया वो भी सिराहने रखी टेबल पर यूँ ही पड़ा रहा।
शाम को जब अम्मी ने सीने में भींचकर उसके बालों को सहलाया, ज़ूनी की आँखें बह चलीं। अम्मी ने उसके आंसू पोछे। फिर उसने बताना शुरू किया।
बीते दिनों किसी सहेली ने उसकी अम्मी के बारे में कुछ बेहूदी बातें कह दी थी कि ज़ूनी उनकी अपनी लड़की नहीं है। ज़ूनी हिन्दू की लड़की है और '93 के दंगों में वो उसे कही रोती हुई मिली थी।
अम्मी क्या ये सच है? ज़ूनी ने पूछा।
बेटा सच क्या है झूठ क्या है, आज इस बात से कोई फऱक नहीं पड़ता। तुम मेरी ज़ूनी हो और हमेशा मेरी बेटी रहोगी।
तुम्हारी माँ ने उस वखत सिरफ़ इतना कहा था मुझसे-
मेरी बेटी, जमुना।
मैंने निकाह नहीं किया। क्योंकि मेरा सब कुछ तुम हो।
ज़ूनी ने अपने हाथ पर आंसू की बूंदों की गरमाहट को महसूस किया। और भी कसकर अम्मी से लिपट गयी।
उसने अपनी अम्मी के आंसुओं को पोछा और अपने भी।
जमुना खुश थी कि ज़ूनी सच जान चुकी थी।

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© Snehil Srivastava