Path to humanity

Path to humanity
We cannot despair of humanity, since we ourselves are human beings. (Albert Einstein)

Friday, March 13, 2015

निर्वाण: काश, आज फिर
Nirvaana: The Innocent afterlife!

काश आज फिर एक मौत आ जाये

वैसी ही हंसीन सी
कुछ कुछ बेहतरीन सी
सपनों के पंखों तले
साँझ का सुकून जब ढले
मैं उड़ जाऊं दूर कहीं
जहाँ खोया हुआ निश्चय मिले
काश आज फिर...

मासूमियत का तरुवर हो जहाँ
अठखेलियां करें सारे मिल वहाँ
विजय को ना फिर विश्राम हो
पराजय को भी प्रणाम हो
आसक्ति का रूप बदल
आदि शक्ति सा नाम हो
काश आज फिर...

हो अंत का ना अंत कभी
जो नींद आये मैं जागूँ तभी
अस्वीकार करूँ स्वीकार्यता का मोह
मौत का आलिंगन जब हो
सत्य दर्शन से मिलूं मैं फिर
ले सके जो मेरे मन की टोह
काश आज फिर...

सजीव हो उठें हर मृत विचार
हो जाये हर सपना साकार
अस्तित्व की अंधी दौड़ रुके
आँधियाँ चलें, ना कोई पत्ता झुके
ऐसी हो आज एक सुबह
सांस रुके ये सृष्टि रुके

काश आज फिर एक मौत आ जाये

Picture credit: www.fineartamerica.com (Vrindavan Das)
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Tuesday, February 10, 2015

तुझे देखा था कहीं
The glimpse!

मेरे शेर तेरी इल्तज़ा ये मासूम मोहब्बत
सयाने हो चले हैं वक़्त के साथ चलते चलते
इन्हें समझना इतना भी मुश्किल ना होता
रात तो आती ही है बस दिन ढलते ढलते

ज़र्द हुआ नस नस में बसा तेरा सुरूर ऐ हसीन कातिल
तुझे देखा था मैंने ख्वाबों में मेरे साथ चलते
तेरा सर झुका के यूँ बैठना मुझे गंवारा नहीं
मैंने कहीं देखा है मोहब्बत की शमां को जलते

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Monday, February 2, 2015

अँधेरा
The lovely darkness

कुछ उसका था कुछ मेरा था
जहां में ना जाने कितना अँधेरा था
हर ओर की हवा बस एक ओर बहती थी
पहुचनें को जहाँ लम्बा पहरा था
घुट घुट के जीना है मौत पर भारी
उस शख्स ने देखा एक ख्वाब सुनहरा था
पंछी उड़ गए सारे तिनकों के घरौंदों से
चहकता था जो कभी खाली वो बसेरा था

रूह तक उतर जाए ऐसी इबादत थी
खुदा जाने क्यों अब भी बहरा था
मैं भी शरीफ़ था अपने गुमान में
फ़रिश्ता था वो या कोई और चेहरा था
पानी बह गया सारा आँखों के रस्ते से
खून को देखा वो अब भी ठहरा था
कुछ उसका था कुछ मेरा था
जहां में ना जाने कितना अँधेरा था
                                                              -Snehil Srivastava

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Sunday, January 25, 2015

वो अंतिम कविता
One, last poem!


यदि मैं लिख भी दूँ वो अंतिम कविता
तो क्या पता
सुबह की नई दस्तक हो जाये
फूलों की बगिया फिर से महक जाये

रात आये चांदनी लिए
और टिमटिमाते तारों की रौशनी से
सारा आकाश दीवाली मनाये
यदि मैं लिख भी दूँ वो अंतिम कविता

सन्नाटे का शोर सुखन देने वाला हो
आँखें बंद हों तो सुकून मिलने वाला हो
यही एहसास होठों पर सदा मुस्कराहट लाये
यदि मैं लिख भी दूँ वो अंतिम कविता

निस्तार जीवन में विस्तार झलके
क्षितिज तक पहुचें अनवरत चलके
इसी तरह जीवन पूरा हो जाये
यदि मैं लिख भी दूँ वो अंतिम कविता
तो क्या पता...?

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Wednesday, December 31, 2014

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अनगिनत दीवारों की परतों को करीब से देखने की ख्वाइश सी जगी है दिल में आज, कल या शायद परसों- इनकी परतों से आंसुओं को बहते देखा था परत दर परत आंसू धुंधले हो चले थे उन्हीं दीवारों के पीछे कहकहों की आवाज़ें गूँज रही थीं उसी गूँज में कहीं किसी का सिसकना मेरी ख्वाइश और दीवार की ज़िन्दगी से अनचाहा मेल खा रही थी

बेपरवाह 'मैं'!
The lonely play

मुझे 'मैं' पसंद नहीं
और मुझमें छिपा वो
दोनों में कोई सामंजस्य ही नहीं
एक कहता- रुक जाओ, दूसरा कहे- बस चलते रहो
अरे कोई इस शोर को भी तो देखो
न सको देख, तो कम से कम सुन तो लो
देखा? सुना?
या आँखें कर लीं बंद
अनसुना कर दिया
बड़ा रहस्यमयी है ये मैं
और ये शोर भी
साठ गाँठ लगती है मुझे तो कुछ इनकी
इंतज़ार है मुझे अब
इस मैं के सो जाने का
इस बेपरवाह
शोर के थम जाने का
फिर आएगी वो नींद
गहरी, मखमली सुनहरी

Picture credit: www.naturemoms.com
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ईश्वर ने मांगी एक दुआ
God, a well wisher

बेहद सहज और सुन्दर कोमल
था उसका एहसास
सारे ग़मों से दूरी हो गयी
खुशियाँ हो गयीं पास
समय ने ली ऐसी छलांग की
हर दिन अपना लागे
और रातों को नजदीक से देखा
वो सरपट दौड़ा भागे
उसके समीप्य में समझा मैंने
अपनापन था कहीं पर छुपा हुआ
अब तक मांगे था इंसान हमेशा
फिर ईश्वर ने मांगी एक दुआ
कि उसका साथ रहे मेरा ही
चाहे सब कुछ छूट ही जाये
बाकी सब तो मोह माया है
जाने जो साधू कहलाए

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