Path to humanity

Path to humanity
We cannot despair of humanity, since we ourselves are human beings. (Albert Einstein)

Saturday, May 9, 2015

धुंधलापन
The dullness

अनगिनत दीवारों की परतों को
करीब से देखने की ख्वाइश सी जगी है दिल में
आज, कल या शायद परसों-
इनकी परतों से आंसुओं को बहते देखा था
परत दर परत
आंसू धुंधले हो चले थे
उन्हीं दीवारों के पीछे
कहकहों की आवाज़ें गूँज रही थीं
गूँज में कहीं किसी का सिसकना
मेरी ख्वाइश और दीवार की ज़िन्दगी से
अनचाहा मेल खा रही थी
कल तक पहुँचने की ज़िद
और कल से कहीं दूर चले जाने की कोशिश
मद्धम मद्धम सांसों की तरह
अनवरत हैं
एक एक दीवार को यदि
हाथों से सहलाकर देखूं
तो क्या परतें मुझे मेरे आंसुओं तक
या फिर एक हंसी से मिलने देंगी
या फिर ये ख्वाइश
इन्हीं परतों के साथ धुंधली होती रहेगी
एक दिन ये धुंधलापन मिटकर
अनंत व्योम में कहीं खो जायेगा


-Snehil Srivastava

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Thursday, May 7, 2015

नशा-ए-इश्क़
Love: The end


तुम्हारी आँखों में वो नशा है जो किसी शराब में नहीं
तुम्हारी बातों में वो शिफ़ा है जो किसी आवाज़ में नहीं

बंदोबस्त कर लूँ मैं अगर अपनी मौत का भी
शराबी था, कहेंगे लोग इनका कोई जवाब तक नहीं

मेरी कब्र पर बूँदें जब गिरेंगी तेरे आंसुओं की
जज़्ब हो जाएँगी मिट्टी में ज़रा गहरे तक मेरी

मैं उठूंगा क़यामत के दिन सवाली बनकर
मांगूगा वो सब उससे जिसका हिसाब तक नहीं


-Snehil Srivastava

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Monday, May 4, 2015

जब जब धरा से
The earth and a girl

जब जब धरा से कुहांसा छटा है
बीता परिदृष्य विचलित हुआ है
जो मोहभंग करते, वो अजब थे मदारी
डमरू की धुन पर उनका ही नृत्य हुआ है
जब जब धरा से...

भर गया लगता, है वो घाव सुनहला
जिनपर कभी, ना कोई आंसू बहा है
देखी हैं मैंने कई विकट रातें
बाद जिनके सदा सवेरा ही हुआ है
जब जब धरा से...

वितीर्ण होता हृदय कराहकर बोला-
किसने किया ये जो भी किया है
मौन थे सारे इस प्रश्न को सुनकर
ग्लानि से सभी का शीष झुका है
जब जब धरा से...

अश्रु भी हैं सूखे, ना कोई बोल फूटे
चक्षुओं के रस्ते एक कथा का जन्म हुआ है
चीत्कार करती गुड़िया हमारी दशा पर
निम्न मानव तुमसे, अपराध जघन्य हुआ है
जब जब धरा से...

-Snehil Srivastava

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Saturday, May 2, 2015

कोमल हथेलियाँ
Innocent You, Every Morning

इस सुबह-
तुम्हारी कोमल सुर्ख हथेलियाँ
मुझे मेरे बचपन की
यादों में ले गयीं
इनमे सोंधी सी मेहक है
जब हम गीली मीट्टी को
छुआ करते थे, और तुम्हारी हथेलियाँ
मटियाली हो जाया करती थीं
इन रेखाओं के बीच
छोटे छोटे से घर
बहती ठहरी नदियां
और कुछ रास्ते हुआ करते थे
मुट्ठी बंद कर देने से
मेहक नहीं मिटटी
और ना ही रास्ते कहीँ खोते हैं
बस हम घरों तक पहुँच नहीं सकते
तुमने एक बार शरमाकर
अपना चेहरा
इन्हीं हथेलियों में
छिपा लिया था
वो मखमली हंसी
आज भी मेरे कानों में
गूँज उठती है
जैसे सब कुछ अभी भी वैसा ही हो
तुम्हारी हथेलियाँ भी तो
नहीं बदलीं
वही छोटे छोटे घर
कुछ लंबे रास्ते जरूर मिलें हैं मुझे
काश वो मीट्टी का रंग
हल्का ना पड़ता
और इनकी मेहक
तुमसी ना बदलती

-स्नेहिल श्रीवास्तव

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Friday, May 1, 2015

रूठा प्रतिबिम्ब
The Shadow

प्रतिबिम्ब में यूँ तो
कुछ ख़ास ख़ासियत नहीं होती
रूप जिसका होता है
उसे पूरा नहीं कर पाता
प्रतिरूप जिसपर बनता है
उसमें समां नहीं पाता
पर हर प्रतिबिम्ब अलग है
उसका रूप उसकी नियति

पानी में पानी का प्रतिबिम्ब
आकाश का कहीं खोया प्रतिबिम्ब
हवाओं का भी होता है क्या
या फिर रौशनी का चमकता प्रतिबिम्ब
जीवन प्रतिबिम्ब, मृत्यु प्रतिबिम्ब
जीत सा अथवा हार का प्रतिबिम्ब
दिखता नहीं कही दूर तलक भी
मुझसे मेरा रूठा प्रतिबिम्ब

-Snehil Srivastava
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Thursday, April 30, 2015

कुछ रंग
Colours

कोशिश की थी मैंने
हाथों में पानी पकड़ने की
निर्जीव हुए जीवन में
कुछ रंग भरने की
मुझको कहा किसी ने
बावरे मन, ना कर ये पागलपन
पानी हाथ से बस छू जायेगा
आँखें होंगी तेरी नम
मेरे उत्तर को सुनकर
वो आवाक् रह गया
सर उस बेचारे का
शरम से था झुक गया
"यदि कोशिशें ना होंगी
तो लक्ष्य कैसे मिलेगा
थक कर बैठने वाले को
ईश्वर भी जाने क्या कहेगा"

-Snehil Srivastava

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काजल
Kaajal

इतना सारा काजल?
पर तुम्हारी आँखें तो
वैसे ही खूबसूरत है
बातें जो कर लेती हैं

बड़ी अदा से
पलकें झपकना
होठों पर मुस्कराहट लाना
मुझसे अनजाना बन जाना

मेरा वास्ता ना भी हो तुमसे
किन्तु मैं क्या करूँ
हंसना तो
मुझे भी अच्छा लगता होगा

मुझे क्या भाया तुममें
पूछो खुद से
जवाब मिले
तो मुझे बताना जरूर

एक बार भी तो
नहीं हुआ ऐसा
कि तुम्हें देखूं
और ईश्वर से मिलन न हो

नहीं मांग रहा मैं
तुमसे कुछ भी
तुम्हें तो, सच जानो
इस बार नहीं

सब कुछ बीतकर
वापस आता ही है
आज कल नहीं
तो फिर कभी

तुम्हारा गहरा काजल
तुम्हारी स्मृति
तुम्हारे पल
याद रहेंगे मुझे।

-Snehil Srivastava

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पोस्टमैन
Postman

पोस्टमैन कहता था वो खुद को-
चिट्ठियां पहुँचाने वाला
यहां से वहां,
वहां से जाने कहाँ कहाँ
गांव की गोरी की चिठ्ठी
शहर में बाबू को
कि मैं ठीक हूँ, मुन्नी बीमार है
कब आओगे,
मुन्नी के बापू?
दोस्त बने
दो अनजानों की चिठ्ठी
अपने सुख दुःख को बांटते
बीतते दिनों में
पोस्टमैन बाबू की राह ताकते
माँ की चिठ्ठी,
जिसके जवाब के इंतज़ार में
उसकी आँखें पथरा सी गयी हैं
कि आज कुछ खबर लाएंगे
पोस्टमैन बाबू मेरे बेटे की
इन सैकड़ो चिट्ठियों में
कभी किसी का जन्म
कभी किसी की मृत्यु
हुआ करती है
गला भर आता है कई बार
ख़ुशी से छलकते आंसू भी
दिखें हैं कई दफ़ा
ढेरों चिट्ठियां, उनके बीच पोस्टमैन बाबू
कोई नहीं भेजता इन्हें
एक भी चिट्ठी
कोई नहीं लेता खबर
इनके सुखों की, इनके दुखों की
और ये खुद-
अनगिनत लोगों के चेहरों पर
संतुष्टि का भाव देखकर
सहज ही मुस्कुरा पड़ते हैं
पोस्टमैन ना हुए,
कोई और हो गए

                                                 -Snehil Srivastava

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Tuesday, April 28, 2015

हे वीर! आखिर तू है कौन?
O' Braveheart!

फांसी दी जा रही थी उसे
बड़े जोर-शोर, गाजे-बाजे के साथ
माथे पर तिलक
भुजाओं पर चन्दन
मुख ललाट पर कान्ति
और भी ना जाने
कितनी अबूझ भ्रान्ति
पर वो शान्त
एकटक शून्य को निहार रहा था
उसकी अनंत कलाओं में
ये भी एक कला थी
शब्द एक नहीं
बातें गहरी, अनकही
उसका तेज
मृत्यु पटल की कालिमा को
क्षीण कर दे रहा था
बलि-वेदी, यज्ञ-वेदी जान पड़ती थी
और वो मंत्रो के पवित्र उच्चारण में
स्वाहा होने को तत्पर
हर बीतता क्षण
नए जन्म की दिशा में
पुरजोर बढ़ रहा था
ना कोई विस्मय
ना ही कोई ग्लानि
केवल-
विजय और गर्व का सम्मिलन
हे वीर! आखिर तू है कौन?
ओम! शांतिः!

Death is not that beautiful for everyone. But for him death is one divine thing. All for that Almighty, with all love. With all happiness.


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जीत और हार- कुछ पहलू
Failure- A Boon

हारना तब आवश्यक हो जाता है जब लङाई
"अपनों से हो" ...और....
जीतना तब आवश्यक हो जाता है जब लङाई "अपने आप से हो"
मंजिल मिले ना मिले ये तो मुकदर की बात है!
हम कोशिश भी ना करे ये तो गलत बात है
-हरिवंशराय बच्चन

इन्हीं शब्दों से विस्मृत कुछ शब्द मेरे-
कोशिश- यही तो अनवरत है यही तो सत्य है हारो जीतो फिर हारो इसी का महत्व है
मुकद्दर- सबका हो जरुरी नहीं अगर हो काफ़ी नहीं मेहनत में कुछ तो बात है जीत ना हो संभव नहीं
अपने- वो हैं जो साथ हंसे वो भी हैं जो साथ रोएं वो नहीं जो साथ छोड़ें हाँ वो हैं जो हिम्मत को जोडें
हार- होने दो कोई बात नहीं दो पल की होगी, मुलाकात सही थकना नहीं बस जरा सी दूरी है हार है कोई मौत नहीं
जीत- खुद से लड़ाई है जिसने भी पायी है ना हो ना सही कौन सी जग हंसाई है

Countesy- Bhupendra Tyagi

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© Snehil Srivastava