Path to humanity

Path to humanity
We cannot despair of humanity, since we ourselves are human beings. (Albert Einstein)

Tuesday, June 10, 2014

देखूं तुझे माँ मेरी Godly mother


देखूं तुझे माँ मेरी
आँखें बंद हों, आँखें बंद हों
मेरे दिल में तू रहे
जैसे तेरा साथ हो
माथा जब हाथों से छुए तू तो
जैसे हर ख़ुशी मिले मुझे
आँखें नम हों, आँखें नम हों
देखूं तुझे माँ मेरी

जियूँ तेरे लिए माँ
पर याद आये, याद आये तो
करूँ जो भी दिल मेरा कहे
सर पर तेरा हाथ हो
मैं तो चला आऊंगा इक दिन
बिना बात के, तेरे साथ को
आँखें भर आई हैं, हाँ भर आई हैं
देखूं तुझे माँ मेरी
देखूं तुझे माँ मेरी...

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© Snehil Srivastava

Saturday, May 17, 2014

Lost?


Deep down something in me is lost...
that zeal that strength and all...
I claimed my way out into the sun...
now I am burnt down under,within!

All that's mine is gone or stolen?
or else I've squandered that golden!!!
dilemma persist, resists, breaks me down...
if I'm still in me existing or "its" gone?

I ruled out all the books of rules...
fished out all the dirt and lose...
guess what...this world is made of...
that very same earth and rock!!

Lost within...I still think...I will persist!
all these games of trip and tricks...
No one is born with destiny engraved...
I still at least have my high held head!

And on top of all that bullshit...
remember my last wish...
Long term gains short term loss!!
baby I am my own boss!! 

:)  :)  :) hehe!!

                                                                    - Lokesh 'Human@Core'


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Wednesday, April 9, 2014

एक नयी सुबह


इस काली रात के बाद
एक नयी सुबह तो होगी शायद
पर इन ख्वाबों को देखकर लगता है
आँखें मूदें रहूँ, फिर ना उठूँ
फिर ना उठूँ, कुछ कर गुजरने को
फिर से जीकर, फिर से मरने को
पर इन झंझावातों के बाद
एक नयी सुबह तो होगी शायद

यदि हार भी है एक पहलू
जीत के दुर्व्यवहार का
तो इन हारों को देखकर लगता है
अब ना जीतूं, फिर ना जीतूं
फिर ना जीतूं, एक भी नश्वर जीत से
हार जाऊं हर जीत अपनी ही निश्छल प्रीत से
पर इन हारों के बाद
एक नयी सुबह तो होगी शायद





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Wednesday, March 12, 2014

रात की माया (raat ki maaya)

रात हुई है गहरी काली
बयार चले है मद्धम मद्धम
और पानी की बूंदों की टप टप
जैसे फैली हो मीठी सरगम
छूकर इनको लगता है जैसे
कोमलता मन की इठलाये
स्वप्नलोक की परियों जैसे
सोते मन को ये बहलाये
अधरों पर मुस्कान सुनहरी
आ जाये बस यूँ ही एक पल
काश ना बीते रात ये काली
हो जाये सब निश्छल निश्छल
हुआ है सब कुछ शांत सरल अब
अंत का अंत होने को आया
या है ये शुरुआत नयी एक
या काली रात की गहरी माया

raat hui hai gehri kaali
bayaar chale hai madhyam madhyam
aur paani ki boondon ki tap tap
jaise faili ho meethi sargam
chukar inko lagta hai jaise
komalta man ki ithlaye
swapnlok ki pariyon jaise
sote man ko ye behlaye
adhron par muskaan sunahri
aa jaye bas yun hee ek pal
kaash na beete raat ye kaali
ho jaye sab nishchal nishchal
hua hai sab kuch shant saral ab
ant ka ant hone ko aaya
ya hai ye shuruaat nayi ek
ya kaali raat ki gehri maaya


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Wednesday, February 26, 2014

कहीं सुना हैं मैंने (Kahin suna hai maine)


हूँ तल्ख़ क्यूँ इन दिनों मैं यूँ
जब सोचता हूँ तो हंस लेता हूँ
राह गुज़र हवाओं से पूछूं
कोरे जज़बातों से क्या कहता हूँ
हूँ शामिल मैं भी कतार में
दोज़ख के रस्ते ज़न्नत की फ़िराक़ में
हर शाम की भीनी खुशबूं से पूछूं
इस गमीं में क्यूँ रहता हूँ

जब भी मैंने देखा खुद का अक्स कहीं
मुंह फिरा लेने को दिल चाहे
दिल की सुनूं और हार ना जाऊँ
इन बातों से क्यूँ डरता हूँ
कहीं सुना हैं मैंने, खुदा भी है
और चारों तरफ फैला गुनाह भी
किस किस से कहूं बातें हज़ार
सोच कर ही चुप रहता हूँ

hu talkh kyu in dino mai yu
jab sochta hu to has leta hu
raah guzar hawaon se puchu
kore jazbaton se kya kehta hu
hu shamil mai bhi kataar me
dozakh ke rastey jannat ki firaq me
har sham ki bheeni khushbu se puchu
is gami me kyu rehta hu

jab bhi maine dekha khud ka aks kahi
muh fira lene ko dil chahe
dil ki sunu aur haar na jaun
in baton se kyu darta hu
kahi suna hai maine, khuda bhi hai
aur charon taraf faila gunaah bhi
kis kis se kahun batein hazar
soch kar hee chup rehta hu


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Thursday, February 13, 2014

यदि मैं पत्थर होता Story of a STONE


यदि मैं पत्थर होता-
या तो तोड़ता, या खुद टूट जाता
पर अपना अंत मैं ना पाता
एक लकीर सी होने से
भगवन शंकर सा रूप पाता
किसी के महल में सज जाता
या किसी मंदिर में पूजा जाता
चन्दन को घिसकर शीतलता पाता
मूर्त रूप होकर ईश्वर कहलाता।

यदि मैं पत्थर होता।
मेरी कठोरता मेरा अहम् होती
जिसे हर पल चकनाचूर किया जाता
मानो तो कोयला तराशो तो हीरा
अपनी चमक पर मैं मुस्कुराता
राम लिख दो मुझपर तो तैर जाता
या फिर खुद से द्वन्द्व कर अग्नि बरसाता
छोटे बच्चों का खिलौना बन जाता
और फिर बार बार, हर बार तोड़ा जाता।

यदि मैं पत्थर होता।
मेरा हृदय भी तो पत्थर ही कहलाता
आघात लगने पर सब सेह जाता
आंसू भी ना बहते, दर्द भी ना होता
धीरे-धीरे मैं और पत्थर होता जाता
काशी में होता तो गंगा साथ होती
मरघट में होकर सिर्फ राख पाता
मिटटी से बनकर, मिटटी में मिलकर
ना जाने और कितने रास रचाता।

यदि मैं पत्थर होता।
कितनी अनूठी ये दुनिया मेरी होती
मेरा नाम लेकर बातें कितनी होतीं
जब भी कोई रोता उसे शक्ति देता
पराजय को जय में बस यूँ ही बदल देता
पानी की कल कल ध्वनि मुझसे होती
जब भी मैं उठता महाप्रलय होती
पर ये सत्य होता तो क्या ना होता?
इंसान ना होता, मैं पत्थर ही होता।

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Wednesday, January 29, 2014

बरसों पहले A long ago

इस सहमीं आहट तले
सुकून तो नहीं मिलता
फिर होता है एहसास
कि कुछ तो है हुआ
ना आज, ना ही कल
बरसों पहले

जब जब यूँ होता मुझपर
ह्रदय तीर्ण हो उठता है
खुद को रोक लेने का साहस
हर बार नहीं दिखता है

ना है ये चंचलता मन की
ना ही कोई दुःसाहस है
खोया कुछ पा लेने की चाह
हर पल लगती ह्रदय विदारक है

यदि मैं अब थम भी जाऊं
कुछ तो न बदल पाउँगा
छुटी हुई जीवन धुरी को
अब मैं ना पकड़ पाउँगा
ना आज, ना ही कल
बरसों पहले

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Wednesday, January 22, 2014

अतिरेक Spontaneous overflow in tranquility


कहाँ गया वो भाव
तुमसे मिलते रहने का चाव
जब अतिरेक में कह जाता था तुमसे अपना ह्रदय
कहना अब भी चाहता हूँ पर
किससे, कहूं कैसे ?
धूमिल हुई हैं कुछ
मुस्कुराहटें
सूख चुके हैं आंसू सब
पर एहसास तो अब भी है। 
यदि मैं चीख पडूं तो न बदलेगा कुछ
सत्य जो ठहरा
यूँ कुछ ढूंढ़ते रहना
थका सा देता है मुझे
ये एक ही तो जीवन है
काश एक बार फिर शुरू हो जाता
काश एक बार फिर मुस्कुराता
अतिरेक में बह जाता
थोड़े ही सही, मीठे भाव जगाता
दुनिया को लुभाता
और फिर गहरी नींद में सो जाता
सपनों को पास पाकर
एक सिहरन सी उठती है
जैसे सपना नहीं
हो सत्य का अटूट साथ
रह जाऊँ यहीं
सदा के लिए
और ये सजल निर्ममता
वहीँ रहे
उसी भारी सुकून में
नश्वर अमरत्व को पाकर
मुझसे दूर
सपनों की मेहक से परे


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Sunday, January 19, 2014

बिटिया की शादी है An incident















अभी अभी ध्यान आया कि कुछ लिखना अधूरा रह गया था, तो सोचा खाली बैठा हूँ तो उसे पूरा ही कर चलूँ।
रह जाती हैं कुछ बांतें यूँ ही अधूरी। और कोई भी नहीं देता है उन पर ध्यान। बस वो निष्प्राण पड़ी रहती हैं मन के किसी कोने में दुबकी सी। पर यदि हम उन्हें तवज्जो ना दे सकें तो कम से कम ध्यान में तो रख ही सकते हैं।
बात ना तो बहुत पुरानी है ना ही बिलकुल नयी। होती ही रहती है यहाँ वहाँ, हर जगह। हमारे इसी संभ्रांत समाज में।
चारों ओर रौशनी फैली हुई है जैसे रात नहीं दिन है। मद्धम मद्धम सा शोर लगातार ही हो रहा है। हर कोई किसी ना किसी काम में लगा हुआ है। छोटे छोटे बच्चे बस खेले ही जा रहें हैं। फूलों की खुशबू, सतरंगी झालरें और फिल्मों के गाने सुन-दिख रहे हैं। आखिर हो भी ना क्यों इतनी ख़ुशी का माहौल, बिटिया की शादी जो है। सजी संवरी गुड़िया लग रही है आज ये शैतान। इसने तो जैसे एक पल को भी चुप ना होने की कसम खा रखी थी। आज थोड़ी चुपचाप सी, सकुचाती सी, लजाती सी दिख रही है। जैसे जैसे रस्मों- रिवाजों का समय करीब आ रहा है, दिल की धड़कन बस बढ़ रही है जैसे सारा शोर उस धड़कन की आवाज़ के आगे धीमा पड़ गया हो।
खुश हैं सब, ख़ुशी में दादी विवाह-गीत गा रही हैं। बहनें सजी संवरी सी अपनी दीदी को और भी सुन्दर बना देना चाहती हैं। भाई को तो चैन नहीं है कि एक क्षण को भी दम ले सके। सभी हर एक काम के लिए उसे ही आवाज़ दे रहे हैं।
आनन्द और मैं समय से पहले अपनी प्यारी दोस्त रुषाली कि शादी में पहुँच चुके थे। सभी किसी ना किसी काम में व्यस्त थे। ज़ाहिर है हम शादी में लड़की वालों की ओर से थे और हमारे लायक काम भी बहुत सारे थे पर काम करे कौन? रुषाली के छोटे भाई ने हमें एक shared room दे दिया जिससे हम change वग़ैरह कर सकें। पर अभी तो बारात के आने में थोड़ा समय था तो हमनें सोचा चलो इंतेज़ामात का जाएज़ा लिया जाये और हम अपना सामान अलमारी में रखकर बाहर आ गए। सब कुछ बहुत सुन्दर आँखों को सुकून देने वाला बगिया की तरह था। शादी थी, ख़ुशी का माहौल था और हम दो निठल्ले थे। हम यहाँ वहाँ घूमकर वापस अपने कमरे में आ गये। तो देखा सामने एक 40 - 45 बरस के अंकल बैठे हुए थे। देखने में शालीन, संभ्रांत से थे। पूछने पर पता चला रुषाली के मामाजी लगते हैं। थोड़ी बातें हुई, जैसे हम कहाँ काम करते हैं, रुषाली को कैसे जानते हैं वगैरह वगैरह। फिर हम दोनों main function के लिए तैयार होने लगे।

कुछ मिनटों बाद फ़ोन बजा, फ़ोन ना मेरा था ना ही आनन्द का। अंकल अपने में ही मगन थे ना जाने क्या सोच रहे थे और उनका फ़ोन अपनी पूरी शक्ति के साथ उन्हें जगाना चाहता था, परन्तु हर कोशिश में असफल हो रहा था। आनन्द ने उन्हें याद दिलाने की कोशिश की कि उनका फ़ोन बड़ी तत्परता से उनसे कुछ तो कहना चाहता है। आखिरकार फ़ोन की 7 - 8 मिन्नतों के बाद उन्हें अपने निष्प्राण साथी पर कुछ तरस आ गया जो कुछ पलों के लिए जीवंत हो उठा था।

अंकल: "हैलो, कौन?"
(हाँ, मैं राजीव शर्मा।)

अंकल: "अच्छा अच्छा, राजीव भाई। कहो क्या हाल चाल हैं? भाभी जी कैसी हैं और बच्चे?"
("हाँ - हाँ, सब ठीक हैं और आप बताइये आपके क्या हाल हैं। कहाँ रहते हैं? बहुत दिनों से मुलाक़ात नहीं हुई आपसे तो सोचा फ़ोन ही कर लूँ")


अंकल: "अरे कहीं नहीं राजीव भाई। शादी ब्याह का मौसम है तो थोड़ी व्यस्तता बढ़ गयी है।"
("हाँ ये तो है। तो किसी शादी में हैं क्या?")

अंकल: "जी हाँ। बिलकुल सही पकड़ा आपने।"
("शादी में गए हैं तो आज तो थोड़ा बहुत.... अरे आप समझ रहे हैं ना? हा हा हा हा" )

अंकल: "नहीं नहीं राजीव कैसे बातें करते हो? यार बिटिया की शादी है मामा हूँ मैं उसका........"

इस एक वाक्य ने हम दोनों के हृदयों में उन अंकल जी के प्रति उनकी इज्जत को बढ़ा सा दिया था तभी-

"………बस 2 पैक पिया है, हा हा हा हा"
("हा हा हा हा.…हा हा हा हा")

हम दोनों अवाक थे। इन दो वाक्यों की दूरी में इतना अंतर भी हो सकता था ये मैंने तो कभी ना सोचा था।
शादी की सारी रीतियाँ एक तरफ निभायी जा रही थीं और समाज की (कु)रीतियाँ.....?
ये प्रश्न आज भी मुझमें बहुत गहरे तक बैठा हुआ है जिसका उत्तर शायद कहीं नहीं है।
क्या आपके पास है इस प्रश्न का उत्तर?














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© Snehil Srivastava

Tuesday, January 14, 2014

खून का रंग Why blood...?


मरे हुए खून का रंग काला होता है
ये कोई नयी बात तो नहीं
जब भी हुई है निरीह की हत्या
बदलता कुछ भी तो नहीं
खून के कतरे का यूँ टपकना
जैसे कही कुछ बाँतें अनकही
जब ये जम कर काला पड़ जाता है
इतना भी तो सख्त लगता नहीं

आज भी कल भी और सदा से ही
ये दिल क्यूँ दहकता नहीं
क्या जब अपना खून बहेगा
तब होगी बातें कुछ सही
रात से काला खून का ये रंग
सुबह की मेहक से मिलता क्यूँ नहीं
मरे हुए खून का रंग काला होता है
ये कोई नयी बात तो नहीं


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© Snehil Srivastava