Path to humanity

Path to humanity
We cannot despair of humanity, since we ourselves are human beings. (Albert Einstein)

Tuesday, June 2, 2009

...म्हारे को म्हारे सासुरे भेज दो...

मुझे मेरे ससुराल भेज दो
वहां ये मेरा हाल भेज दो
माँ का रोना अब देखा नही जाता
पिता का खिलौना अब टेका नहीं जाता
मुझे अब उन दूजे फूलों की सेज दो
मुझे मेरे ससुराल भेज दो


भैया से लडाई अब याद आती है
गुड्डे गुडियों की सगाई अब याद आती है
देखो भैया मुझे फिर रुलाता है
फिर प्यार से छुटकी बुलाता है
इन सारी बातों को कहीं सहेज दो
मुझको मेरे ससुराल भेज दो

जब मै मेरे ससुराल जाउंगी
इन बातों को ना भूल पाऊँगी
सबकी मुझको याद आएगी
सोने पर भी नींद ना आएगी
माँ...! तुम मुझे अपना सा तेज दो
मुझे मेरे ससुराल भेज दो...

9 comments:

  1. thanks didu....!!!
    thanks for the very first comment, u r always so lucky to me...see...

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  2. wow
    bhaiya its so emotional
    luved it
    very nice

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  3. yeh kya likh diya hai Snehil tumne
    haddd hai yaar

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  4. Cute poem hai, bilkul tumhari tarah.............par dil chhuu jati hai kahin

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  5. #Pallavi: Thanks.
    #Saurabh: Thanks bhai...

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