Path to humanity

Path to humanity
We cannot despair of humanity, since we ourselves are human beings. (Albert Einstein)

Saturday, September 5, 2015

Self Ousted

Dedicated to everyone who left their homes to build their own - Irony!
क़द्र नहीं अच्छाई की इस 'सूने' शहर में
जुबां पे ना सही अच्छाई तो होती इस दिल--ज़िक्र में
शहर से शहर, गाँव से गाँव घूम आया वो अदना मुसाफिर
ना भीख मिली, दिल भी गया- कासा भी खोया जाने किस फ़िक्र में

लाज़मी है कि वो लोग कुछ और रहे होंगे
मांगने बांटने के तरीके भी कुछ बदले जरूर रहे होंगे
शहरों के सूनेपन मुसाफिरों की भीड़ से यूँ तो नहीं बढ़ जाया करते
कुछ टूटे सपने रहे होंगे कुछ छूटे अपने रहे होंगे
(waiting for some more lines to write upon)
-Snehil Srivastava
 Picture credit: (none)
(Note- No part of this post may be published reproduced or stored in a retrieval system in any forms or by any means without the prior permission of the author.)
© Snehil Srivastava

No comments:

Post a Comment