Path to humanity

Path to humanity
We cannot despair of humanity, since we ourselves are human beings. (Albert Einstein)

Wednesday, August 20, 2014

बड़ी सोच- Only 'Think big'


नींद। - नींद।
मैं भी था वहाँ पे...औरों की तरह ही था...उन्हीं जैसा...
लेकिन हमेशा कहता था..."और लोगों की तरह थोड़ी ना हूँ मैं..."

मैंने ना सोच रखा था..कुछ बड़ा करने को पैदा हुआ हूँ...जरूर।

अपने को मैंने किस्सी से कम तो कभी नहीं...हाँ थोड़ा ज्यादा जरूर समझा है...बड़ा समझा है...

मुझे हमेशा लगता था...सारी दुनिया कितनी मतलबी है...

और मैं...खैर...

मै खड़ा सोचता रहा...अपनी गाड़ी से उतरा तक नहीं।।।

उस भिखारी को सड़क से खुरच कर निकालना पड़ा...ऐसा छपा था अख़बार में।

बड़ा छोटा महसूस हुआ!! बस गाड़ी से उतर कर उसे जगा कर कह देता कल रात..."साले! साइड होके सो...कोई ठोक के चला जायेगा..."

                                                                          - Lokesh 'Human@core'


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© Snehil Srivastava

Thursday, August 14, 2014

राजकाज


खाना - खाना
"घर ना हो गया...जीवन का जंजाल हो गया"...कहता हुआ वो घर से निकला...साइकिल उठाई...गेट खोला...और पंदले मारता बाहर निकल गया।

"मै ना लाऊं सब्जी तो क्या कोई खाना नहीं खायेगा...मुझे क्या सब्जी लाने के लिए घर में रखा है??" इसी गुस्से भरे ख़याल को अपने मन में सोचता बोला..." भैया 2 किलो आलू...1 किलो प्याज...टमाटर 250 ग्राम ही देना...आज पैसे कुछ कम मिले हैं...और हाँ कल की सब्जी में आधे आलू सड़े निकले...आज एक भी ख़राब निकला तो तो कटा हुआ वापिस ले आऊंगा...!"

"कितने हुए?"

"कुछ कम कर लो!"

वापिस मुड़ गया...वो...शायद ध्यान भटक गया पैसे गिनने में...और एक ठोकर लगी...वो बेहोश...

तीसरे दिन जब आँख खुली तो माँ रोती हुयी नज़र आई...वो बोला " माँ भूख लगी है...कुछ दो...और रो मत...ये सब तो राजकाज है!"

खाना बना था आज भी...!!

                                                                - Lokesh 'Human @core'


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बेटियां- A girl child


पुराने समय से एक अवधारणा चली आ रही है कि जो जितना करुणाशील है, जितना सहिष्णु है; समाज उसे पीछे धकेल देना चाहता है अपनी रीतियों से, अपनी कुरीतियों से परन्तु यदि इतिहास के पन्नो को पलट कर एक गहरी नज़र डालें तो हम पाएंगे, ये सारी दानवी शक्तियां कभी सफल न हो सकी हैं. हाँ ये ज़रूर है इन्हें गाहे बगाहे आंशिक सफलता ज़रूर मिल जाती है.

इस बात की पुष्टि के लिए बेटी से बेहतर उदहारण कुछ हो ही नही सकता. बेटी जो कभी मातृत्व की छाँव देती हैं तो कभी बहन बनकर एक अनुपम साथी होती है. भार्या होती है तो जीवन के हर विष को खुद पी लेना चाहती है और यदि मित्र बनती है तो हर पग को सचेत करती है. और पुरुष प्रधान  समाज हर स्तर पर स्वयं को पहली सीढ़ी पर खड़ा देखना  है. एक क्षण को कल्पना करते हैं- बेटी विहीन विश्व की. कुछ भी देख सकें हैं आप सभी? विश्व का सृजन उसका अस्तित्व एक अंधकारमय अनुभूति देता है. इस  बात की कल्पना से ही मन सिहर उठता है.

 यदि ऐसा है तो फिर क्यों बेटी का सम्मान नहीं किया जाता। नारीत्व एक शक्ति है समाज की, फिर क्यों समाज उस पर घिनौने कृत्यों के पत्थरों से वार करता है. उसे चोट पहुंचता है. उसे नष्ट करता है.

सबसे पहला- जन्म.
बहुधा सुनने में आता है की लड़की हुई तो कम ख़ुशी हुई, लड़का होता तो बात कुछ और होती. आखिर घर का चिराग होता है लड़का. तो क्या बेटियां वो काम नहीं कर सकतीं जो एक लड़का करता है या कर सकता है? बिलकुल कर सकती हैं. आखिर कर ही तो रही हैं. शिक्षा, विज्ञान, खेलकूद, राजनीति, सेना, अंतरिक्ष. सभी मोर्चो पर बेटियां कहीं बेहतर सभीत हुई हैं. इसलिए बेटी के जन्म पर सबसे अधिक खुश होना होगा हमें तभी एक संपूर्ण विश्व की परिकल्पना संभव होगी.

सम्मान का दूसरा रूप है- सामजिक स्तर. हम कितने भी आधुनिक क्यों ना हो जाएं परन्तु जब बेटियों को समाज में बराबर की हिस्सेदारी की बात आती है तो लोग मौन हो जाते हैं. कुप्रथाओं के बानिग हर संभव प्रयास किया जाता है कि बेटियां सदेव बेटों से कमतर रहे. अरे उन्हें भी समान अधिकार है कदम से कदम मिलाकर चलने का, अपना शीष ऊँचा रखने का.

तीसरा और सबसे महत्त्वपूर्ण सम्मान एक बेटी का तभी हो सकता है जब उसे बेटी
कहा जाये. माता पिता भी कभी दुलार में कह जाते हैं 'तू तो मेरा बेटा है'. नहीं, बेटियां गर्व से बेटियां हैं. इसी में उनका अस्तित्व निहित है.

यदि बेटी माँ दुर्गा के रूप में सृजन की पोषक हैं तो यही रूप समाज के राक्षसों को मृत्यु भी प्रदान कर सकता है.


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Sunday, August 10, 2014

फिर याद आयी यारों की यारी- Friends Forever


आज फिर याद आयी यारों की यारी
वो ज़िन्दगी हमारी मस्ती से भरी
पुराने किस्सों में बीतें रातें हमारी
बेफिक्र होकर जीने की ज़िद वो हमारी
बारिश की बूंदों से वो भिगोना तुम्हे
खुद भी गिरना और गिराना तुम्हे
और बस हँसकर भुला देना वो भूलें हमारी
आज फिर याद आयी यारों की यारी

तुम्हारे साथ रातों में तारों को गिनना
और फिर छोटे बड़े सपनों को बुनना
हाथों में हाथ डाल दूर हुई मुश्किलें हमारी
आज फिर याद आयी यारों की यारी
आज अलग ही सही पर जुड़ीं हैं राहें हमारी
कुछ तुम चलो, कुछ हम चलें- मिटा दें ये दूरियां सारी
दोहराएंगे फिर किस्से पुराने, बातें सुहानी
दुआ करें कभी ना टूटे ये यारी हमारी
आज फिर याद आयी यारों की यारी

                                                                        --Neha Bakshi

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Sunday, July 27, 2014

The purpose of life


"That innocence from childhood memories ain't dead but are sleeping. The dreams of future, essence of present and darkness of past have covered it with dust of impatience.
Existence of life is ambiguous. Moreover its reason. To beautify its real and far most true meaning one must see through his soul, his inner self; no different with a child's heart and his innocence."
- his death seems to be the answers of all the burned questions. She could only has ashes now.

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Tuesday, July 8, 2014

ये प्रहरी है, ये गर्व है, ये ताकत है। Indian Soldiers


याद कश्मीर की- भाग 1

सैनिक! शब्द है ये? बिलकुल नहीं। सैनिक सिर्फ एक शब्द नहीं हो सकता। ये जीवन है। हमारा, हम सबके सम्मान का।
ठण्ड में भीगते हुए चौकसी में पहाड़ों पर खड़े रहना एक छोटे से स्टोव, एक मग और एक छोटी प्लेट के साथ। खुद ही खाना बनाना होता है यहाँ। हर एक की आँखों में गर्व भरी रौशनी होती है। और यदि धूप देखकर हमारे माथे पर शिकन आ जाये तो भी सैनिक का देशप्रेम सर्वोपरि होता है और वो उसी तरह डटा रहता है हम सबकी रक्षा के लिए। हम जिन छोटी परेशानियों से घबरा जातें हैं, डर जाते हैं और रुक जाते हैं वो सारी की सारी परेशानियां उन्हें मामूली नज़र आती हैं। ज़िन्दगी का हर पल आखरी होता है पर उसे भी दूसरों के लिए ही लगा देना यदि सीखना हो तो सैनिक से सीखो। मौसम कोई भी हो सैनिक सिर्फ हमारी रक्षा करता है अपना घर द्वार कहीं पीछे छोड़कर वो हम सबका हो जाता है। यदि रस्ते पर जाम लगा हो तो सैनिक आ जाता है हमें गतिशील करने के लिए। यदि कहीं कोई दुर्घटना हुई हो तो भी वही हमारी ढाल बन जाता है, हमें खतरों के बीच सुरक्षित रखता है, हमें चैन से सोने देने के लिए स्वयं सारी रात जागता है, हँसता भी है ये सैनिक छोटी छोटी खुशियों पर, हमारी !
ये प्रहरी है, ये गर्व है, ये ताकत है। ये सैनिक है।


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Tuesday, June 10, 2014

देखूं तुझे माँ मेरी Godly mother


देखूं तुझे माँ मेरी
आँखें बंद हों, आँखें बंद हों
मेरे दिल में तू रहे
जैसे तेरा साथ हो
माथा जब हाथों से छुए तू तो
जैसे हर ख़ुशी मिले मुझे
आँखें नम हों, आँखें नम हों
देखूं तुझे माँ मेरी

जियूँ तेरे लिए माँ
पर याद आये, याद आये तो
करूँ जो भी दिल मेरा कहे
सर पर तेरा हाथ हो
मैं तो चला आऊंगा इक दिन
बिना बात के, तेरे साथ को
आँखें भर आई हैं, हाँ भर आई हैं
देखूं तुझे माँ मेरी
देखूं तुझे माँ मेरी...

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Saturday, May 17, 2014

Lost?


Deep down something in me is lost...
that zeal that strength and all...
I claimed my way out into the sun...
now I am burnt down under,within!

All that's mine is gone or stolen?
or else I've squandered that golden!!!
dilemma persist, resists, breaks me down...
if I'm still in me existing or "its" gone?

I ruled out all the books of rules...
fished out all the dirt and lose...
guess what...this world is made of...
that very same earth and rock!!

Lost within...I still think...I will persist!
all these games of trip and tricks...
No one is born with destiny engraved...
I still at least have my high held head!

And on top of all that bullshit...
remember my last wish...
Long term gains short term loss!!
baby I am my own boss!! 

:)  :)  :) hehe!!

                                                                    - Lokesh 'Human@Core'


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Wednesday, April 9, 2014

एक नयी सुबह


इस काली रात के बाद
एक नयी सुबह तो होगी शायद
पर इन ख्वाबों को देखकर लगता है
आँखें मूदें रहूँ, फिर ना उठूँ
फिर ना उठूँ, कुछ कर गुजरने को
फिर से जीकर, फिर से मरने को
पर इन झंझावातों के बाद
एक नयी सुबह तो होगी शायद

यदि हार भी है एक पहलू
जीत के दुर्व्यवहार का
तो इन हारों को देखकर लगता है
अब ना जीतूं, फिर ना जीतूं
फिर ना जीतूं, एक भी नश्वर जीत से
हार जाऊं हर जीत अपनी ही निश्छल प्रीत से
पर इन हारों के बाद
एक नयी सुबह तो होगी शायद





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Wednesday, March 12, 2014

रात की माया (raat ki maaya)

रात हुई है गहरी काली
बयार चले है मद्धम मद्धम
और पानी की बूंदों की टप टप
जैसे फैली हो मीठी सरगम
छूकर इनको लगता है जैसे
कोमलता मन की इठलाये
स्वप्नलोक की परियों जैसे
सोते मन को ये बहलाये
अधरों पर मुस्कान सुनहरी
आ जाये बस यूँ ही एक पल
काश ना बीते रात ये काली
हो जाये सब निश्छल निश्छल
हुआ है सब कुछ शांत सरल अब
अंत का अंत होने को आया
या है ये शुरुआत नयी एक
या काली रात की गहरी माया

raat hui hai gehri kaali
bayaar chale hai madhyam madhyam
aur paani ki boondon ki tap tap
jaise faili ho meethi sargam
chukar inko lagta hai jaise
komalta man ki ithlaye
swapnlok ki pariyon jaise
sote man ko ye behlaye
adhron par muskaan sunahri
aa jaye bas yun hee ek pal
kaash na beete raat ye kaali
ho jaye sab nishchal nishchal
hua hai sab kuch shant saral ab
ant ka ant hone ko aaya
ya hai ye shuruaat nayi ek
ya kaali raat ki gehri maaya


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© Snehil Srivastava