Path to humanity

Path to humanity
We cannot despair of humanity, since we ourselves are human beings. (Albert Einstein)

Friday, November 21, 2014

काश ऐसा मेरा एक गुलिस्तां होता
"Irony Of Life"

बड़ा कारगर होता ग़र मैं ज़रा बईमान होता
पेड़ों को काटा होता तो मेरा भी एक मकान होता
हाथों में भी ख़ुशबू होती ग़र मैंने फूल तोड़े होते
इंसान तो ना सही, हाँ बस थोड़ा हैवान होता
बेख़ौफ़ सबसे रहता अपनी खाली हुकूमत में
पर ये तभी होता, ना मुझ सा जहाँन होता
हर ओर खून बहता जब मेरी कटार चलती
एक एक कतरा बहता ये दिल बेजान होता

रूहानियत ना होती मैं उसके रूबरू होता
इंसानियत ना होती, कितना सुकून होता
मैं उससे सवाल करता इन सारी वजहों की
ज़ालिम खुदा भी अब बेज़ुबान होता
मैं अगला जनम भी लेता इसी हक़ से लेकिन
खुदा जाने 
किसका इसमें एहसान होता?

मुस्कुराता मैं अब तो अपनी शिकस्त पर खुलकर
काश 
मेरा ऐसा एक गुलिस्तां होता




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© Snehil Srivastava

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